Sunday, February 20, 2011

सोनिया गांधी को कितना जानते हैं आप?

जब इंटरनेट और ब्लॉग की दुनिया में आया तो सोनिया गाँधी के बारे में काफ़ी कुछ पढने को मिला । पहले तो मैंने भी इस पर विश्वास नहीं किया और इसे मात्र बकवास सोच कर खारिज कर दिया, लेकिन एक-दो नहीं कई साईटों पर कई लेखकों ने सोनिया के बारे में काफ़ी कुछ लिखा है जो कि अभी तक प्रिंट मीडिया में नहीं आया है (और भारत में इंटरनेट कितने और किस प्रकार के लोग उपयोग करते हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है) । यह तमाम सामग्री हिन्दी में और विशेषकर "यूनिकोड" में भी पाठकों को सुलभ होनी चाहिये, यही सोचकर मैंने "नेहरू-गाँधी राजवंश" नामक पोस्ट लिखी थी जिस पर मुझे मिलीजुली प्रतिक्रिया मिली, कुछ ने इसकी तारीफ़ की, कुछ तटस्थ बने रहे और कुछ ने व्यक्तिगत मेल भेजकर गालियाँ भी दीं (मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्नाः) । यह तो स्वाभाविक ही था, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह रही कि कुछ विद्वानों ने मेरे लिखने को ही चुनौती दे डाली और अंग्रेजी से हिन्दी या मराठी से हिन्दी के अनुवाद को एक गैर-लेखकीय कर्म और "नॉन-क्रियेटिव" करार दिया । बहरहाल, कम से कम मैं तो अनुवाद को रचनात्मक कार्य मानता हूँ, और देश की एक प्रमुख हस्ती के बारे में लिखे हुए का हिन्दी पाठकों के लिये अनुवाद पेश करना एक कर्तव्य मानता हूँ (कम से कम मैं इतना तो ईमानदार हूँ ही, कि जहाँ से अनुवाद करूँ उसका उल्लेख, नाम उपलब्ध हो तो नाम और लिंक उपलब्ध हो तो लिंक देता हूँ) ।
पेश है "आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं" की पहली कडी़, अंग्रेजी में इसके मूल लेखक हैं एस.गुरुमूर्ति और यह लेख दिनांक १७ अप्रैल २००४ को "द न्यू इंडियन एक्सप्रेस" में - अनमास्किंग सोनिया गाँधी- शीर्षक से प्रकाशित हुआ था ।
"अब भूमिका बाँधने की आवश्यकता नहीं है और समय भी नहीं है, हमें सीधे मुख्य मुद्दे पर आ जाना चाहिये । भारत की खुफ़िया एजेंसी "रॉ", जिसका गठन सन १९६८ में हुआ, ने विभिन्न देशों की गुप्तचर एजेंसियों जैसे अमेरिका की सीआईए, रूस की केजीबी, इसराईल की मोस्साद और फ़्रांस तथा जर्मनी में अपने पेशेगत संपर्क बढाये और एक नेटवर्क खडा़ किया । इन खुफ़िया एजेंसियों के अपने-अपने सूत्र थे और वे आतंकवाद, घुसपैठ और चीन के खतरे के बारे में सूचनायें आदान-प्रदान करने में सक्षम थीं । लेकिन "रॉ" ने इटली की खुफ़िया एजेंसियों से इस प्रकार का कोई सहयोग या गठजोड़ नहीं किया था, क्योंकि "रॉ" के वरिष्ठ जासूसों का मानना था कि इटालियन खुफ़िया एजेंसियाँ भरोसे के काबिल नहीं हैं और उनकी सूचनायें देने की क्षमता पर भी उन्हें संदेह था ।
सक्रिय राजनीति में राजीव गाँधी का प्रवेश हुआ १९८० में संजय की मौत के बाद । "रॉ" की नियमित "ब्रीफ़िंग" में राजीव गाँधी भी भाग लेने लगे थे ("ब्रीफ़िंग" कहते हैं उस संक्षिप्त बैठक को जिसमें रॉ या सीबीआई या पुलिस या कोई और सरकारी संस्था प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री को अपनी रिपोर्ट देती है), जबकि राजीव गाँधी सरकार में किसी पद पर नहीं थे, तब वे सिर्फ़ काँग्रेस महासचिव थे । राजीव गाँधी चाहते थे कि अरुण नेहरू और अरुण सिंह भी रॉ की इन बैठकों में शामिल हों । रॉ के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने दबी जुबान में इस बात का विरोध किया था चूँकि राजीव गाँधी किसी अधिकृत पद पर नहीं थे, लेकिन इंदिरा गाँधी ने रॉ से उन्हें इसकी अनुमति देने को कह दिया था, फ़िर भी रॉ ने इंदिरा जी को स्पष्ट कर दिया था कि इन लोगों के नाम इस ब्रीफ़िंग के रिकॉर्ड में नहीं आएंगे । उन बैठकों के दौरान राजीव गाँधी सतत रॉ पर दबाव डालते रहते कि वे इटालियन खुफ़िया एजेंसियों से भी गठजोड़ करें, राजीव गाँधी ऐसा क्यों चाहते थे ? या क्या वे इतने अनुभवी थे कि उन्हें इटालियन एजेंसियों के महत्व का पता भी चल गया था ? ऐसा कुछ नहीं था, इसके पीछे एकमात्र कारण थी सोनिया गाँधी । राजीव गाँधी ने सोनिया से सन १९६८ में विवाह किया था, और हालांकि रॉ मानती थी कि इटली की एजेंसी से गठजोड़ सिवाय पैसे और समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है, राजीव लगातार दबाव बनाये रहे । अन्ततः दस वर्षों से भी अधिक समय के पश्चात रॉ ने इटली की खुफ़िया संस्था से गठजोड़ कर लिया । क्या आप जानते हैं कि रॉ और इटली के जासूसों की पहली आधिकारिक मीटिंग की व्यवस्था किसने की ? जी हाँ, सोनिया गाँधी ने । सीधी सी बात यह है कि वह इटली के जासूसों के निरन्तर सम्पर्क में थीं । एक मासूम गृहिणी, जो राजनैतिक और प्रशासनिक मामलों से अलिप्त हो और उसके इटालियन खुफ़िया एजेन्सियों के गहरे सम्बन्ध हों यह सोचने वाली बात है, वह भी तब जबकि उन्होंने भारत की नागरिकता नहीं ली थी (वह उन्होंने बहुत बाद में ली) । प्रधानमंत्री के घर में रहते हुए, जबकि राजीव खुद सरकार में नहीं थे । हो सकता है कि रॉ इसी कारण से इटली की खुफ़िया एजेंसी से गठजोड़ करने मे कतरा रहा हो, क्योंकि ऐसे किसी भी सहयोग के बाद उन जासूसों की पहुँच सिर्फ़ रॉ तक न रहकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक हो सकती थी ।
जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था तब सुरक्षा अधिकारियों ने इंदिरा गाँधी को बुलेटप्रूफ़ कार में चलने की सलाह दी, इंदिरा गाँधी ने अम्बेसेडर कारों को बुलेटप्रूफ़ बनवाने के लिये कहा, उस वक्त भारत में बुलेटप्रूफ़ कारें नहीं बनती थीं इसलिये एक जर्मन कम्पनी को कारों को बुलेटप्रूफ़ बनाने का ठेका दिया गया । जानना चाहते हैं उस ठेके का बिचौलिया कौन था, वाल्टर विंसी, सोनिया गाँधी की बहन अनुष्का का पति ! रॉ को हमेशा यह शक था कि उसे इसमें कमीशन मिला था, लेकिन कमीशन से भी गंभीर बात यह थी कि इतना महत्वपूर्ण सुरक्षा सम्बन्धी कार्य उसके मार्फ़त दिया गया । इटली का प्रभाव सोनिया दिल्ली तक लाने में कामयाब रही थीं, जबकि इंदिरा गाँधी जीवित थीं । दो साल बाद १९८६ में ये वही वाल्टर विंसी महाशय थे जिन्हें एसपीजी को इटालियन सुरक्षा एजेंसियों द्वारा प्रशिक्षण दिये जाने का ठेका मिला, और आश्चर्य की बात यह कि इस सौदे के लिये उन्होंने नगद भुगतान की मांग की और वह सरकारी तौर पर किया भी गया । यह नगद भुगतान पहले एक रॉ अधिकारी के हाथों जिनेवा (स्विटजरलैण्ड) पहुँचाया गया लेकिन वाल्टर विंसी ने जिनेवा में पैसा लेने से मना कर दिया और रॉ के अधिकारी से कहा कि वह ये पैसा मिलान (इटली) में चाहता है, विंसी ने उस अधिकारी को कहा कि वह स्विस और इटली के कस्टम से उन्हें आराम से निकलवा देगा और यह "कैश" चेक नहीं किया जायेगा । रॉ के उस अधिकारी ने उसकी बात नहीं मानी और अंततः वह भुगतान इटली में भारतीय दूतावास के जरिये किया गया । इस नगद भुगतान के बारे में तत्कालीन कैबिनेट सचिव बी.जी.देशमुख ने अपनी हालिया किताब में उल्लेख किया है, हालांकि वह तथाकथित ट्रेनिंग घोर असफ़ल रही और सारा पैसा लगभग व्यर्थ चला गया । इटली के जो सुरक्षा अधिकारी भारतीय एसपीजी कमांडो को प्रशिक्षण देने आये थे उनका रवैया जवानों के प्रति बेहद रूखा था, एक जवान को तो उस दौरान थप्पड़ भी मारा गया । रॉ अधिकारियों ने यह बात राजीव गाँधी को बताई और कहा कि इस व्यवहार से सुरक्षा बलों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और उनकी खुद की सुरक्षा व्यवस्था भी ऐसे में खतरे में पड़ सकती है, घबराये हुए राजीव ने तत्काल वह ट्रेनिंग रुकवा दी,लेकिन वह ट्रेनिंग का ठेका लेने वाले विंसी को तब तक भुगतान किया जा चुका था ।
राजीव गाँधी की हत्या के बाद तो सोनिया गाँधी पूरी तरह से इटालियन और पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों पर भरोसा करने लगीं, खासकर उस वक्त जब राहुल और प्रियंका यूरोप घूमने जाते थे । सन १९८५ में जब राजीव सपरिवार फ़्रांस गये थे तब रॉ का एक अधिकारी जो फ़्रेंच बोलना जानता था, उनके साथ भेजा गया था, ताकि फ़्रेंच सुरक्षा अधिकारियों से तालमेल बनाया जा सके । लियोन (फ़्रांस) में उस वक्त एसपीजी अधिकारियों में हड़कम्प मच गया जब पता चला कि राहुल और प्रियंका गुम हो गये हैं । भारतीय सुरक्षा अधिकारियों को विंसी ने बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है, दोनों बच्चे जोस वाल्डेमारो के साथ हैं जो कि सोनिया की एक और बहन नादिया के पति हैं । विंसी ने उन्हें यह भी कहा कि वे वाल्डेमारो के साथ स्पेन चले जायेंगे जहाँ स्पेनिश अधिकारी उनकी सुरक्षा संभाल लेंगे । भारतीय सुरक्षा अधिकारी यह जानकर अचंभित रह गये कि न केवल स्पेनिश बल्कि इटालियन सुरक्षा अधिकारी उनके स्पेन जाने के कार्यक्रम के बारे में जानते थे । जाहिर है कि एक तो सोनिया गाँधी तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के अहसानों के तले दबना नहीं चाहती थीं, और वे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर विश्वास नहीं करती थीं । इसका एक और सबूत इससे भी मिलता है कि एक बार सन १९८६ में जिनेवा स्थित रॉ के अधिकारी को वहाँ के पुलिस कमिश्नर जैक कुन्जी़ ने बताया कि जिनेवा से दो वीआईपी बच्चे इटली सुरक्षित पहुँच चुके हैं, खिसियाये हुए रॉ अधिकारी को तो इस बारे में कुछ मालूम ही नहीं था । जिनेवा का पुलिस कमिश्नर उस रॉ अधिकारी का मित्र था, लेकिन यह अलग से बताने की जरूरत नहीं थी कि वे वीआईपी बच्चे कौन थे । वे कार से वाल्टर विंसी के साथ जिनेवा आये थे और स्विस पुलिस तथा इटालियन अधिकारी निरन्तर सम्पर्क में थे जबकि रॉ अधिकारी को सिरे से कोई सूचना ही नहीं थी, है ना हास्यास्पद लेकिन चिंताजनक... उस स्विस पुलिस कमिश्नर ने ताना मारते हुए कहा कि "तुम्हारे प्रधानमंत्री की पत्नी तुम पर विश्वास नहीं करती और उनके बच्चों की सुरक्षा के लिये इटालियन एजेंसी से सहयोग करती है" । बुरी तरह से अपमानित रॉ के अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इसकी शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं हुआ । अंतरराष्ट्रीय खुफ़िया एजेंसियों के गुट में तेजी से यह बात फ़ैल गई थी कि सोनिया गाँधी भारतीय अधिकारियों, भारतीय सुरक्षा और भारतीय दूतावासों पर बिलकुल भरोसा नहीं करती हैं, और यह निश्चित ही भारत की छवि खराब करने वाली बात थी । राजीव की हत्या के बाद तो उनके विदेश प्रवास के बारे में विदेशी सुरक्षा एजेंसियाँ, एसपीजी से अधिक सूचनायें पा जाती थी और भारतीय पुलिस और रॉ उनका मुँह देखते रहते थे । (ओट्टावियो क्वात्रोची के बार-बार मक्खन की तरह हाथ से फ़िसल जाने का कारण समझ में आया ?) उनके निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज सीधे पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों के सम्पर्क में रहते थे, रॉ अधिकारियों ने इसकी शिकायत नरसिम्हा राव से की थी, लेकिन जैसी की उनकी आदत (?) थी वे मौन साध कर बैठ गये ।
संक्षेप में तात्पर्य यह कि, जब एक गृहिणी होते हुए भी वे गंभीर सुरक्षा मामलों में अपने परिवार वालों को ठेका दिलवा सकती हैं, राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के जीवित रहते रॉ को इटालियन जासूसों से सहयोग करने को कह सकती हैं, सत्ता में ना रहते हुए भी भारतीय सुरक्षा अधिकारियों पर अविश्वास दिखा सकती हैं, तो अब जबकि सारी सत्ता और ताकत उनके हाथों मे है, वे क्या-क्या कर सकती हैं, बल्कि क्या नहीं कर सकती । हालांकि "मैं भारत की बहू हूँ" और "मेरे खून की अंतिम बूँद भी भारत के काम आयेगी" आदि वे यदा-कदा बोलती रहती हैं, लेकिन यह असली सोनिया नहीं है । समूचा पश्चिमी जगत, जो कि जरूरी नहीं कि भारत का मित्र ही हो, उनके बारे में सब कुछ जानता है, लेकिन हम भारतीय लोग सोनिया के बारे में कितना जानते हैं ? (भारत भूमि पर जन्म लेने वाला व्यक्ति चाहे कितने ही वर्ष विदेश में रह ले, स्थाई तौर पर बस जाये लेकिन उसका दिल हमेशा भारत के लिये धड़कता है, और इटली में जन्म लेने वाले व्यक्ति का....)
(यदि आपको यह अनुवाद पसन्द आया हो तो कृपया अपने मित्रों को भी इस पोस्ट की लिंक प्रेषित करें, ताकि जनता को जागरूक बनाने का यह प्रयास जारी रहे)

Sunday, October 24, 2010

मुस्लिम मुख्यधारा मैं शामिल क्यूँ नहीं हो पाते : एक बड़ी वजह ये है.

गिलानी जैसे ये लोग हमारे मुस्लिम भाइयों को इस्लाम के नाम पर कुछ इस तरह बरगलाते हैं । और हमारे शासन के पास कोई शक्ति नहीं जो इस तरह से लोगों को ठिकाने लगा सके। यहाँ पर जो विडिओ मैं दे रहा हूँ। ज़रा गौर कीजियेगा इसपर और अपनी बेबाक राय दीजियेगा एक एक शब्द को सुन कर....

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Thursday, October 21, 2010

किशोरों मैं शराब का बढ़ता प्रचालन : हो हल्ला न मचाएं, समाधान सुझाएँ

किशोर-वयसंधि की आयु के लोग शराब की ओर रुख कर रहे हैं. एक टीवी चैनल और दैनिक समाचार पत्र मैं यह खबर देखने और पढने को मिली. बात कोई नयी नहीं है. हम सब वाकिफ हैं इस तथ्य से. और कहीं न कहीं चिंतित भी होंगे. आखिर हमारे परिवारों मैं से कोई हो सकता है.

तो क्या समाज जाने अनजाने छूट दे रहा है? क्या हम अपनी अगली पीढी के भविष्य के प्रति सजग नहीं हैं? क्या शिक्षा और समय के अनुरूप कुछ ज्यादा ही आज़ादी दी जा रही है बढते बच्चों को ? क्या हो रहा है परिवारों मैं जो बहुत खतरनाक है? आखिर इस व्यवहारिक परिवर्तन का ज़िम्मेदार कौन है ?

मुझे लगता है कि परिवारों मैं एकांत वास और दूरियां बनाने का जो रिवाज़ चल पड़ा है हमारे समाज मैं, यह बदलाव कमोबेश उसी का नतीजा है. ऐसा क्यूँ होता है कि आजकल हर किसी को अपने लिए अलग आकाश की ज़रूरत पद रही है ? चाहे उसे उसकी आवश्यकता हो या न हो? कहीं न कहीं ये अलग थलग रहना, खुद मैं उलझे रहना और तनाव ही ऐसे मनोविकारों के कारण बन रहे हैं?

परिवार के एक इकाई के रूप मैं टूटने और सामाजिक दायित्व वाली सोच का घटना भी कहीं न कहीं इसका मूल कारण है. आये जागें और सम्हालें उन पौधों को जिन पर भविष्य के विकास के फल लगने हैं. हम सभी अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर ऐसे बच्चों को सहारा दें उन्हें सही दिशा दिखाएँ. हो हल्ला कर देना ही काफी नहीं होता. कंधों पर ज़िम्मेदारी का भोझ रखना भी हमको सीखना है और ऐसी समस्याओं से निपटना है.

Saturday, October 16, 2010

बदलता भारत : उदारवादी राष्ट्र से पूंजीवादी राष्ट्र की ओर

भारतवर्ष की तस्वीर हमारे संविधान बनाने वालों ने उदारवादी लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप मैं उकेरी। कुछ दशकों तक तो हम अपने देश को इसी राह पर लेकर आगे बढे। परन्तु अगर हम पिछले दो दशकों पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि अब हमारा रुझान अमेरिका की पूंजीवादी आर्थिक नीतियों से प्रभावित हो रहा है।

दो दशक पूर्व तक की सरकारें देश के विशाल माध्यम वर्ग को आधार मान कर उसकी सामाजिक और आर्थिक उन्नति को केंद्र मानते हुए नीति निर्धारण करती रही हैं। पर इतर कुछ ऐसा हनी लगा कि वो विशाल मध्य वर्ग असुरक्षित होता जा रहा है।

इस परिवर्तन का सबसे चौंका देने वाला प्रभाव यह पड़ा कि धन के तो अम्बार लग गए पर वो धन कुछ ख़ास ही लोगों की तिजोरियों की शोभा बढाने के काम आने लगा।

यकायक सरकारी नौकरियां घटने लगीं। जो लोग सरकारी नौकरियों की बदौलत पीढ़ी दर पीढ़ी अपना जीवन यापन करते आ रहे थे उनके पैरों तले धरती खिसकने लगी। ऐसा क्यों हो रहा है ? यह एक बहुत गंभीर सवाल है। जो सरकारी पद समाप्त कीये जा रहे हैं क्या उनसे सम्बद्ध कार्य अब नहीं रहा ? नहीं ऐसा कतई नहीं है। काम है।
तो फिर सरकारी नौकरियों के लिए रिक्तियों की संख्या घटी क्यूँ जा रही है? क्या आबादी कम हो रही है? जो कि काम करने वाले भी कम ही चाहियें? नहीं, ऐसा भी नहीं है? या फिर सरकारी खजाने मैं वेतन देने के लिए धन का ही टोटा है ? नहीं, ऐसा भी नहीं है? फिर कारण क्या है? कुछ प्रबुद्ध लोग तर्क देते हैं कि ठेके दारी के अंतर्गत काम करवाना अधिक लाभकारी है। इस लिए पक्की नौकरी न देकर ठेकेदार के द्वारा कार्य को संपन्न करवाना चाहिए।

ठेका लेने वाले लोग केवल अपने लाभांश को मछली आँख मानकर बस उसी का ध्यान लखते हैं। उनको कार्य की गुणवत्ता से कोई लेने-देना नहीं होता। ऐसे बहुतेरे उदहारण हम आये दिन दिल्ली महानगर मैं गिरते पुलों, टूटी सड़कों के रूप मैं देखते ही रहते हैं। क्यूंकि ठेकेदार ठेका लेने के लिए कितनी भी घूस दे सकता है और जितनी ज्यादा घूसरशी होगी वो गुणवत्ता उतनी ही कम करके काम को जैसे तैसे पूरा करेगा। और ठेकेदारों से काम इसलिए भी करवाते हैं कि काम कम समय मैं हो जाता है क्यूंकि सरकारी कर्मचारी काम करने के मामले मैं उतने चुस्त-दुरुस्त नहीं होते जितनी कि प्राइवेट कामगार। कुछ हद तक मैं इस कथन से सहमत हूँ। पर क्या इसका समाधान नहीं खोजा जाना चाहिए था?

आज जब हमारा प्यारा भारत देश एक विश्व महाशक्ति बनने की दिशा मैं अग्रसर है, हमे अपने देशवासियों के लिए उत्तम स्वाथ्य सुविधाएँ , विश्व स्तरीय परिवहन सुविधाएँ , बैंकिंग व्यवस्थाएं, रेल तंत्र, सुरक्षा और उद्योग, सूची तो बहुत लम्बी होगी, विकसति करनी हैं। क्या वह पूरा काम हम मध्य वर्ग के भविष्य को सुरक्षित किये बिना हम इन ठेकेदारों के थोथे भरोसे के बल पर कर पायेंगे?

सारकारी तंत्र को जागना होगा। निजी राजनैतिक स्वार्थों के खेल को दरकिनार करके इस दिशा मैं ठोस कदम उठाना ही होगा। नहीं तो फिर से हमारा देश पुराने सूदखोर महाजन जैसे आधुनिक महाजनों के मायाजाल मैं फंस जाने वाला है ।

यदि कोई सजग प्रयास नहीं किया गया तो .... फिर ... क्रान्ति होगी ... जैसे रूस मैं हुई थी .... अक्टूबर क्रान्ति ॥ खुनी क्रान्ति होगी ... और गरीब अपनी गरीबी को खून से धोने से भी नहीं हिचकेगा।

Thursday, October 14, 2010

दिखाने के खेलों का शुभ समापन, और घोटाले छिपाने का खेल शुरू...

खेलों का शुभ समापन हो गया. भारत की साख बच गयी है. सब लोग खुश हैं. सोने के तमगों की गिनती भी बढ़ गयी है. आयोजन से जुडे सब लोग राहत की सांस ले रहे हैं. अच्छी बात है, पर इससे भी अच्छी बात तब होगी जब इनसब लोगों के काले कारनामे भी उजागर होंगे. और दोषी लोगों को दण्डित करने की कार्रवाही ईमानदारी से होगी. जिसकी आशा मुझे और इस देश कि जनता को कतई नहीं है.

सफल आयोजन की ख़ुशी के तले कहीं उन सबके काले कारनामे भी हमेश की तरह दब कर ना रह जाएँ. हमें और सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए. नहीं तो भ्रष्टाचार के माहिर लोगों को बल मिलेगा और माहौल बद से बदतर होता जायेगा.

मेरी भारत के देशवासियों से अपील है कि इस मामले को इस तरह से दबाया न जाने दें. यही इस समय राष्ट्र की सबसे बड़ी मांग है. जय हिंद. जय भारत.

Thursday, October 7, 2010

मंदिर-मस्जिद की विवादित भूमि क्या सर्वश्रेष्ठ उपयोग-

मेरे विचार से तो उस पूरी ज़मीन पर एक सर्वसुविधा संपन्न अस्पताल बनाना चाहिए जिसका लाभ हिन्दू, मुसमान, सिख, इसाई, पारसी, सिन्धी, अगड़े, पिछड़े, ऊंचे, नीचे, अमीर, गरीब, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, गरीबी रेखा के ऊपर वाले, गरीबी रेखा के नीचे वाले, कार वाले, बेकार, मजदूर, किसान, रेहड़ी मजदूर, व्यापारी, नौकरी पेशा, सरकारी अफसर, बाबू, चपरासी, पान वाला, फल वाला, प्रेस वाला, मीडिया कर्मी, दिल्ली वाला, दिल वाला, या जिन का निकल गया हो दिवाला,किन्नर, बे-दिल और वो लोग जो शायद किसी गिनती मैं नहीं आते हों, उन सभी को मिलना चाहिए जो इस भारतवर्ष के अभिन्न अंग हैं. क्यूंकि मुझे लगता है कि इस व्यवस्था पर किसी को कोई एतराज़ नहीं होगा. और हो भी..... तो होता रहे. हमें इस नासूर का इलाज करना है. इस देश कि भावी पीढ़ी को मजबूत आधार देना है. किसी के राजनैतिक जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए हम सब कबतक किस किस की बलि चढाते रहेंगे??? सोचो भारत के बेटो.

Sunday, February 14, 2010

गलत नंबर लग गया

एक सरदार जी ने लव मैरिज की पर व्यापार के सिलसिले में उसको विदेश जाना पड़ा। सरदार जी ने विदेश से घर पे
फोन किया तो नौकर से बात हुई।
सरदार जी : मालकिन कहाँ पे हैं?
नौकर : अपने पति के साथ कमरे में।
सरदार : ( ये तो बेवफा निकली ) अरे रामू में हूँ असली मालिक, वो आदमी बदमाश है ।
सरदार : रामू सामने लकड़ी की अलमारी है ?
नौकर : हाँ
सरदार : उसमें बंदूक है ?
नौकर : हाँ।
सरदार : बंदूक निकालो और उस आदमी को गली मारो ।
नौकर : मैने गौली मार डाली है।
सरदार : लाश को मकान के पीछे वाले दरिया में फेंक दो।
नौकर : मगर मालिक घर के पीछे तो कोई दरिया नही है।

सरदार : औह शौरी शायद गलत नंबर लग गया है।
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